श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 3: वीर्य-रस (शूरता)  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  4.3.57 
धर्मोत्साह-रतिर् धीरैः स्थायी भाव इहोच्यते ।
धर्मैकाभिनिवेशस् तु धर्मोत्साहो मतः सताम् ॥४.३.५७॥
 
 
अनुवाद
"ज्ञानी कहते हैं कि धर्मोत्साह-रति ही धर्मवीर का स्थिर भाव है। धर्मोत्साह का अर्थ है केवल धर्म के विषय में लीन रहना।"
 
"The wise say that religious enthusiasm is the constant emotion of a righteous man. Religious enthusiasm means being absorbed solely in matters of religion."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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