श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 3: वीर्य-रस (शूरता)  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  4.3.56 
उद्दीपना इह प्रोक्ताः सच्-छास्त्र-श्रवणादयः ।
अनुभावा नयास्तिक्य-सहिष्णुत्व-यमादयः ॥४.३.५६॥
 
 
अनुवाद
धर्म-वीर के उद्दीपन में शास्त्रों का श्रवण जैसे कार्य शामिल हैं। अनुभव में उचित आचरण, शास्त्रीय नियमों का पालन, सहनशीलता और इंद्रिय संयम के नियमों का पालन शामिल है। व्यवहारिक भाव में मति, स्मृति आदि शामिल हैं।
 
The stimulation of Dharma-veer includes actions such as listening to scriptures. Experience includes proper conduct, adherence to scriptural rules, tolerance, and adherence to the rules of sense control. Practical feeling includes intellect, memory, etc.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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