श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 3: वीर्य-रस (शूरता)  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  4.3.55 
अथ धर्म-वीरः —
कृष्णैक-तोषणे धर्मे यः सदा परिनिष्ठितः ।
प्रायेण धीर-शान्तस् तु धर्म-वीरः स उच्यते ॥४.३.५५॥
 
 
अनुवाद
"धीर-शांत (शांत भक्त) जो हर समय केवल कृष्ण को प्रसन्न करने वाले धर्म में स्थिर रहता है, उसे धर्म-वीर कहा जाता है।"
 
"The dhira-shanta (calm devotee) who at all times remains fixed in the religion that pleases only Krishna is called dharma-veera."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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