श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 3: वीर्य-रस (शूरता)  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  4.3.51 
यथा —
वन्दे कुट्मलिताञ्जलिर् मुहुर् अहं वीरं मयूर-ध्वजं
येनार्धं कपट-द्विजाय वपुषः कंस-द्विषे दित्सता ।
कष्टं गद्गदिकाकुलो’स्मि कथनारम्भाद् अहो धीमता
सोल्लासं क्रकचेन दारितम् अभूत् पत्नी-सुताभ्यां शिवः ॥४.३.५१॥
 
 
अनुवाद
उदाहरण: "मैं मयूरध्वज को हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ। हाय! ब्राह्मण वेशधारी कृष्ण को अपना आधा शरीर अर्पित करने की इच्छा से, उन्होंने अपनी पत्नी और पुत्र को आदेश दिया कि वे आरे से उनका सिर काट डालें। ओह! यह कथा सुनाते हुए मेरा कण्ठ रुँध गया।"
 
Example: "I bow to Mayurdhwaj with folded hands. Alas! Desiring to offer half his body to Krishna, disguised as a Brahmin, he ordered his wife and son to cut off his head with a saw. Oh! my throat chokes while narrating this story."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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