श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 3: वीर्य-रस (शूरता)  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  4.3.50 
दयोत्साह-रतिस् त्व् अत्र स्थायि-भाव उदीर्यते ।
दयोद्रेक-भृद् उत्साहो दयोत्साह इहोदितः ॥४.३.५०॥
 
 
अनुवाद
"स्थायी भाव दयोत्साह-रति है। प्रबल करुणा से युक्त दृढ़ता को दयोत्साह कहते हैं।"
 
"The permanent emotion is Dayotsaha-rati. Firmness combined with intense compassion is called Dayotsaha."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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