श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 3: वीर्य-रस (शूरता)  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  4.3.43 
त्यागोत्साह-रतिर् धीरैः स्थायी भाव इहोदितः ।
त्यागेच्छा तादृशी प्रौढा त्यागोत्साह इतीर्यते ॥४.३.४३॥
 
 
अनुवाद
"ज्ञानी कहते हैं कि इस रस का स्थिर भाव त्यागोत्साह-रति है। त्यागोत्साह का अर्थ है पाँच प्रकार की मुक्ति जैसी चीज़ों को त्यागने की गहन इच्छा।"
 
"The wise say that the constant emotion of this rasa is renunciation-desire. Renunciation means a deep desire to renounce things like the five types of liberation."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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