श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 3: वीर्य-रस (शूरता)  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  4.3.40 
अथ उपस्थित-दुरापार्थ-त्यागी —
उपस्थित-दुरापार्थ-त्यग्य् असौ येन नेष्यते ।
हरिणा दीयमानो’पि सार्ष्ट्य्-आदिस् तुष्यता वरः ॥४.३.४०॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति भगवान द्वारा प्रसन्न होकर दी गई पाँच प्रकार की मुक्ति को भी स्वीकार नहीं करना चाहता, उसे उपस्थित-दुर्रापार्थ-त्यागी (वह जो दूसरों को दुर्लभ रूप से प्राप्त होने वाली वस्तुओं को अस्वीकार करने के लिए दृढ़ है) कहा जाता है।
 
One who does not want to accept even the five kinds of liberation offered by the Lord out of His pleasure is called a parshakta-durrapartha-tyāgi (one who is determined to reject the things that others rarely get).
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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