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श्री भक्ति रसामृत सिंधु
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श्लोक 35
श्लोक
4.3.35
तत्र प्रीति-दानम् —
प्रीति-दानं तु तस्मै यद् दद्याद् बन्ध्व्-आदि-रूपिणे ॥४.३.३५॥
अनुवाद
स्नेहपूर्वक देना: “भगवान को स्नेही मित्र के रूप में जो दिया जाता है उसे प्रीति-दान कहा जाता है।”
Affectionate giving: “What is given to God as an affectionate friend is called priti-dana.”
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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