श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 3: वीर्य-रस (शूरता)  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  4.3.31 
तत्र आभ्युदायिकः —
कृष्णस्याभ्युदयार्थं तु येन सर्वस्वम् अर्प्यते ।
अर्थिभ्यो ब्राह्मणादिभ्यः स आभ्युदायिको भवेत् ॥४.३.३१॥
 
 
अनुवाद
“जो व्यक्ति कृष्ण के लिए ब्राह्मण जैसे याचकों को अपना सब कुछ दे देता है, उसे अभ्युदयिक दानवीर कहा जाता है।”
 
“The person who gives away everything he has to beggars like Brahmins for the sake of Krishna is called an Abhyudaya Danavir.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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