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श्री भक्ति रसामृत सिंधु
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श्लोक 29
श्लोक
4.3.29
दानोत्साह-रतिस् त्व् अत्र स्थायि-भावतयोदिता ।
प्रगाढा स्थेयसी दित्सा दानोत्साह इतीर्यते ॥४.३.२९॥
अनुवाद
"दान-वीरा में, दानोत्सहा-रति स्थाई-भाव है। देने की एक बहुत ही स्थिर इच्छा को दानोत्सहा कहा जाता है।"
"In dāna-vīra, dānotsāha-rati is sthāyi-bhāva. A very steady desire to give is called dānotsāha."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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