श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 3: वीर्य-रस (शूरता)  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  4.3.27-28 
सम्प्रदानस्य वीक्षाद्या अस्मिन्न् उद्दीपना मताः ।
वाञ्छिताधिक-दातृत्वं स्मित-पूर्वाभिभाषणम् ॥४.३.२७॥
स्थैर्य-दाक्षिण्य-धैर्याद्या अनुभावा इहोदिताः ।
वितर्कौत्सुक्य-हर्षाद्या विज्ञेया व्यभिचारिणः ॥४.३.२८॥
 
 
अनुवाद
दानवीर के लिए उद्दीपन का अर्थ है किसी व्यक्ति को दान के योग्य देखना। अनुभव में माँगे गए से अधिक देना, हल्की मुस्कान के साथ बात करना, स्थिरता, दया और धैर्य आदि शामिल हैं। व्यभिचारी भाव हैं वितर्क, औत्सुक्य, हर्ष आदि।
 
For a philanthropist, the stimulus is seeing someone worthy of giving. These include giving more than what is asked for, speaking with a gentle smile, composure, kindness, and patience. The vyabhicharya emotions are debate, curiosity, and joy.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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