श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 3: वीर्य-रस (शूरता)  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  4.3.21 
यथा व —
बलस्य बलिनो बलात् सुहृद्-अनीकम् आलोडयन्
पयोधिम् इव मन्दरः कृत-मुकुन्द-पक्ष-ग्रहः ।
जनं विकट-गर्जितैर् वधिरयन् स धीर-स्वरो
हरेः प्रमदम् एककः समिति भद्रसेनो व्यधात् ॥४.३.२१॥
 
 
अनुवाद
एक और उदाहरण: "कृष्ण की ओर से गम्भीर स्वर वाले भद्रसेन ने अपनी कर्कश गर्जना से बलवान बलराम के पक्ष के मित्रों को बहरा कर दिया और जैसे मंदर पर्वत क्षीरसागर का मंथन करता है, वैसे ही उन्होंने अकेले ही उन सबको मथ डाला। इससे कृष्ण को बहुत प्रसन्नता हुई।"
 
Another example: "Bhadrasena, the deep-voiced man on Krishna's side, deafened the friends of the mighty Balarama with his harsh roar and churned them all single-handedly, just as Mount Mandara churns the ocean of milk. This pleased Krishna greatly."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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