श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 3: वीर्य-रस (शूरता)  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  4.3.18 
युद्धोत्साह-रतिस् तस्मिन् स्थायि-भावतयोदिता ।
या स्वशक्ति-सहायाद्यैर् आहार्या सहजापि वा ।
जिगीषा स्थेयसी युद्धे सा युद्धोत्साह ईर्यते ॥४.३.१८॥
 
 
अनुवाद
“युद्ध में जीतने की वह दृढ़ इच्छा, जो अर्जित हो या स्वाभाविक, या तो स्वयं के बल से या दूसरों की सहायता से प्रोत्साहन से प्रेरित होती है, जो युद्धोत्साह-रति के स्थिर-भाव में आने पर उत्पन्न होती है, युद्धोत्साह कहलाती है।”
 
“That strong desire to win in battle, whether acquired or natural, inspired either by one's own strength or by the encouragement of others, which arises when the passion for war becomes stable, is called war enthusiasm.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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