| श्री भक्ति रसामृत सिंधु » सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस » लहर 3: वीर्य-रस (शूरता) » श्लोक 17 |
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| | | | श्लोक 4.3.17  | चतुष्टये’पि वीराणां निखिला एव सात्त्विकाः ।
गर्वावेग-धृति-व्रीडा-मति-हर्षावहित्थिकाः ।
अमर्षोत्सुकतासूया-स्मृत्य्-आद्या व्यभिचारिणः ॥४.३.१७॥ | | | | | | अनुवाद | | "चारों प्रकार के नायक सभी सात्विक-भाव और सभी व्यभिचारी-भाव दर्शाते हैं जैसे कि गर्व, आवेग, धृति, वृद्धा, मति, हर्ष, अवहित्ता, अमरष, उत्सुकता, असूया और स्मृति।" | | | | "The four types of heroes display all the sattvic-bhavas and all the vyabhichari-bhavas such as pride, impulse, steadfastness, old age, intellect, joy, avhitta, immortality, eagerness, envy and memory." | | ✨ ai-generated | | |
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