श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 3: वीर्य-रस (शूरता)  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  4.3.11 
कत्थितास्फोट-विस्पर्धा-विक्रमास्त्र-ग्रहादयः ।
प्रतियोध-स्थिताः सन्तो भवन्त्य् उद्दीपना इह ॥४.३.११॥
 
 
अनुवाद
"युद्ध-वीर-रस के उद्दीपन शेखी बघारते हैं, चुनौती देते हुए शस्त्र चलाते हैं, प्रतिद्वंद्विता करते हैं, शक्ति प्रदर्शित करते हैं, शस्त्र उठाते हैं और प्रतिद्वंद्वी के शब्दों से उत्तेजित होते हैं।"
 
"The stimuli of the war-heroic rasa are boasting, challenging, wielding weapons, rivalry, displaying strength, taking up arms, and being aroused by the words of the opponent."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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