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श्री भक्ति रसामृत सिंधु
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सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस
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लहर 3: वीर्य-रस (शूरता)
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श्लोक 1
श्लोक
4.3.1
सैवोत्साह-रतिः स्थायी विभावाद्यैर् निजोचितः ।
आनीयमाना स्वाद्यत्वं वीर-भक्ति-रसो भवेत् ॥४.३.१॥
अनुवाद
“जब उत्साह-रति उपयुक्त विभावों और अन्य तत्वों [रस] द्वारा एक सुखद प्रकृति को प्राप्त करती है, तो इसे वीर-भक्ति-रस कहा जाता है।”
“When utshat-rati acquires a pleasant nature by appropriate vibhavas and other elements [rasa], it is called veera-bhakti-rasa.”
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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