श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 5: माधुर्य-रस (प्रेम भाव)  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  3.5.37 
गोपाल-रूप-शोभां दधद् अपि रघुनाथ-भाव-विस्तारी ।
तुष्यतु सनातनात्मा पश्चिम-भागे रसाम्बु-निधेः ॥३.५.३७॥
 
 
अनुवाद
“गोपाल भट्ट के भाव को पोषित करने वाले और रघुनाथ दास के भाव को वितरित करने वाले सनातन इस पश्चिमी महासागर से प्रसन्न हों!”
 
“May Sanatana, who nourishes the Bhava of Gopala Bhatta and distributes the Bhava of Raghunatha Dasa, be pleased with this Western Ocean!”
 
इति श्री-श्री-भक्ति-रसामृत-सिन्धौ पश्चिम-विभागे
मधुराख्य-भक्ति-रस-लहरी चतुर्थी ॥
"इस प्रकार श्री भक्ति-रसामृत-सिंधु के पश्चिमी महासागर में 'माधुर्य-रस' से संबंधित पांचवीं लहर समाप्त होती है।"

इति श्री-श्री-भक्ति-रसामृत-सिन्धौ
मुख्य-भक्ति-रस-निरूपकः पश्चिम-विभागः समाप्तः ॥
"यहां श्री भक्ति-रसामृत-सिंधु का पश्चिमी महासागर 'मुख्य भक्ति रस' समाप्त होता है।"
 
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