श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 5: माधुर्य-रस (प्रेम भाव)  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.5.22 
यथा —
इतो दूरे राज्ञी स्फुरति परितो मित्र-पटली
दृशोर् अग्रे चन्द्रावलिर् उपरि शैलस्य दनुजः ।
असव्ये राधायाः कुसुमित-लता संवृत-तनौ दृग्-
अन्त-श्रीर् लोला तडिद् इव मुकुन्दस्य वलते ॥३.५.२२॥
 
 
अनुवाद
एक उदाहरण: "थोड़ी दूरी पर व्रज की रानी खड़ी हैं, और चारों ओर कृष्ण के मित्र हैं। चंद्रावली उनके ठीक सामने खड़ी है, और अरिष्टासुर व्रज की सीमा पर पथरीली धरती पर खड़ा है। लेकिन कृष्ण की बेचैन दृष्टि केवल राधा के उस रूप पर पड़ती है, जो पुष्पित लताओं से आच्छादित है।"
 
An example: "At a distance stands the queen of Vraja, surrounded by Krishna's friends. Chandravali stands directly in front of her, and Arishtasura stands on the rocky ground at the border of Vraja. But Krishna's restless gaze falls only on Radha's form, which is covered with flowering creepers."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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