श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 5: माधुर्य-रस (प्रेम भाव)  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.5.16 
अथ व्यभिचारिणः —
आलस्यौग्र्ये विना सर्वे विज्ञेया व्यभिचारिणः ॥३.५.१६॥
 
 
अनुवाद
व्यभिचारी-भाव: "माधुर्य-भक्ति-रस में, आलस्य (आलस्य) और औघ्र्य (क्रूरता) को छोड़कर सभी व्यभिचारी-भाव प्रकट होते हैं।"
 
Vyabhicarī-bhāva: "In madhurya-bhakti-rasa, all the vyabhicarī-bhāva appear except ālasya (laziness) and aughrya (cruelty)."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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