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श्लोक 3.4.72  |
मोहः —
कुटुम्बिनि मनस् तटे विधुरतां विधत्से कथं प्
रसारय दृशं मनाक् तव सुतः पुरो वर्तते ।
इदं गृहिणि गृहं न कुरु शून्यम् इत्य् आकुलं
स शोचति तव प्रसूं यदु-कुलेन्द्र नन्दः पिता ॥३.४.७२॥ |
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| अनुवाद |
| मोह: "प्रिय पत्नी! तुम अपने मन में इतना दुःख क्यों उठा रही हो? आँखें खोलो और देखो। तुम्हारा पुत्र तुम्हारे सामने खड़ा है। प्रिय पत्नी! इस घर को खाली मत करो।" हे यदुवंश के राजा! इस प्रकार तुम्हारे पिता नंद अपना दुःख तुम्हारी माता को बताते हैं।" |
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| Moh: "Dear wife! Why are you carrying so much sorrow in your heart? Open your eyes and see. Your son is standing before you. Dear wife! Do not vacate this house." O King of the Yadu dynasty! Thus your father Nanda tells his sorrow to your mother." |
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