श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 4: वात्सल्य-रस (मातृ पितृत्व भाव)  »  श्लोक 69
 
 
श्लोक  3.4.69 
दैन्यम् —
याचते बत विधातर् उदस्रा त्वां रदैस् तृणम् उदस्य यशोदा ।
गोचरे सकृद् अपि क्षणम् अद्य मत्सरं त्यज ममानय वत्सम् ॥३.४.६९॥
 
 
अनुवाद
दैन्यम् (नीचता): “हे स्वार्थी प्रभु! आँखों में आँसू और दाँतों में घास लिए यशोदा आपसे प्रार्थना करती हैं, ‘मुझसे द्वेष त्याग दीजिए और मेरे पुत्र को आज एक बार, थोड़े समय के लिए, मेरे दर्शन में ला दीजिए।”
 
Dainyam (lowliness): “O selfish Lord! With tears in her eyes and grass in her teeth, Yashoda prays to you, ‘Give up your hatred towards me and bring my son to me today, just for a short while, to see me.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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