श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 4: वात्सल्य-रस (मातृ पितृत्व भाव)  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  3.4.68 
जाड्यम् —
यः पुण्डरीकेक्षण तिष्ठतस् ते
गोष्ठे कराम्भोरुह-मण्डनो’भूत् ।
तं प्रेक्ष्य दण्ड-स्तिमितेन्द्रियाद् यद्
दण्डाकृतिस् ते जननी बभूव ॥३.४.६८॥
 
 
अनुवाद
जाड्यम् (निष्क्रियता): “हे कमलनेत्र! गोकुल में आपके कमलहाथ की शोभा बढ़ाने वाली आपकी छड़ी को देखकर आपकी माता आज लकड़ी के समान हो गई हैं, तथा उनकी सारी इन्द्रियाँ रुक गई हैं।”
 
Jadyam (inaction): “O lotus-eyed one! Seeing your stick that adorns your lotus hand in Gokul, your mother has become like wood today, and all her senses have stopped.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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