श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 4: वात्सल्य-रस (मातृ पितृत्व भाव)  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  3.4.60 
अथ अयोगे उत्कण्ठितम्, यथा —
वत्सस्य हन्त शरद्-इन्दु-विनिन्दि-वक्त्रं
सम्पादयिष्यति कदा नयनोत्सवं नः ।
इत्य् अच्युते विहरति व्रज-बाटिकायाम्
ऊर्वी त्वरा जयति देवक-नन्दिनीनाम् ॥३.४.६०॥
 
 
अनुवाद
उत्कण्ठित (प्रथम मिलन से पूर्व वियोग): "जब कृष्ण व्रज के मैदान में क्रीड़ा कर रहे थे, तब देवक की पुत्रियों ने सोचा, 'हे! हम शरद ऋतु के चन्द्रमा को जीतने वाले कृष्ण का मुख कब देखेंगे?' उनकी महान अधीरता की जय हो!"
 
Eagerness (separation before the first union): “When Krishna was playing in the fields of Vraja, the daughters of Devaka thought, ‘O! When will we see the face of Krishna, who conquers the autumn moon?’ Hail their great impatience!”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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