श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 4: वात्सल्य-रस (मातृ पितृत्व भाव)  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.4.6 
तथा श्री-दशमे (१०.८.४५) —
त्रय्या चोपनिषद्भिश् च साङ्ख्य-योगैश् च सात्वतैः ।
उपगीयमान-माहात्म्यं हरिं सामन्यतात्मजम् ॥३.४.६॥
 
 
अनुवाद
श्रीमद्भागवतम् के दशम स्कन्ध [10.8.45] से: “परम पुरुषोत्तम भगवान की महिमा का अध्ययन तीनों वेदों, उपनिषदों, सांख्य-योग के साहित्य और अन्य वैष्णव साहित्य के माध्यम से किया जाता है, फिर भी माता यशोदा ने उस परम पुरुष को अपना साधारण पुत्र माना।”
 
From the tenth canto of Srimad Bhagavatam [10.8.45]: “The glories of the Supreme Personality of Godhead are studied through the three Vedas, the Upanishads, the literature of Sankhya-Yoga and other Vaishnava literature, yet mother Yasoda considered that Supreme Person to be her ordinary son.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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