श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 4: वात्सल्य-रस (मातृ पितृत्व भाव)  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  3.4.52 
अथ स्थायी —
सम्भ्रमादि-च्युता या स्याद् अनुकम्पे’नुकम्पितुः ।
रतिः सैवात्र वात्सल्यं स्थायी भावो निगद्यते ॥३.४.५२॥
 
 
अनुवाद
स्थाई-भाव: "किसी व्यक्ति द्वारा किसी योग्य वस्तु पर करुणा करने की रति को वत्सल-रति कहते हैं। इस वत्सल-रति को वत्सल-रस का स्थाई-भाव कहा गया है।"
 
Sthayi-Bhaav: "The love of compassion shown by a person towards a worthy object is called Vatsala-Rati. This Vatsala-Rati is called the Sthayi-Bhaav of Vatsala-Rasa."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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