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श्लोक 3.4.52  |
अथ स्थायी —
सम्भ्रमादि-च्युता या स्याद् अनुकम्पे’नुकम्पितुः ।
रतिः सैवात्र वात्सल्यं स्थायी भावो निगद्यते ॥३.४.५२॥ |
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| अनुवाद |
| स्थाई-भाव: "किसी व्यक्ति द्वारा किसी योग्य वस्तु पर करुणा करने की रति को वत्सल-रति कहते हैं। इस वत्सल-रति को वत्सल-रस का स्थाई-भाव कहा गया है।" |
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| Sthayi-Bhaav: "The love of compassion shown by a person towards a worthy object is called Vatsala-Rati. This Vatsala-Rati is called the Sthayi-Bhaav of Vatsala-Rasa." |
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