श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 4: वात्सल्य-रस (मातृ पितृत्व भाव)  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  3.4.51 
यथा वा विदग्ध-माधवे (१.२०) —
जित-चन्द्र-पराग-चन्द्रिका
नलदेन्दीवर-चन्दन-श्रियम् ।
परितो मयि शैत्य-माधुरीं
वहति स्पर्श-महोत्सवस् तव ॥३.४.५१॥
 
 
अनुवाद
एक अन्य उदाहरण, विदग्धा-माधव से: "हे कृष्ण! आपके स्पर्श से उत्पन्न महान आनंद मेरे भीतर अत्यंत सुखद शीतलता उत्पन्न करता है, जो प्रचुर कपूर, चांदनी, उशीर (जटामांसी), नीले कमल या चंदन की शीतलता को भी परास्त कर देता है।"
 
Another example, from Vidagdha-Madhava: "O Krishna! The great bliss arising from your touch produces within me a very pleasant coolness, which surpasses even the coolness of abundant camphor, moonlight, ushir (spikenard), blue lotus or sandalwood."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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