श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 4: वात्सल्य-रस (मातृ पितृत्व भाव)  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.4.5 
एवं गुणस्य चास्यानुग्राह्यत्वाद् एव कीर्तिता ।
प्रभावानास्पदतया वेद्यस्यात्र विभावता ॥३.४.५॥
 
 
अनुवाद
“कृष्ण, उपर्युक्त गुणों से संपन्न, किन्तु प्रकट शक्तियों से रहित, स्वयं को करुणा का पात्र मानने के कारण वत्सल-रस के विभाव के रूप में प्रसिद्ध हैं।”
 
“Krishna, endowed with the above qualities, but devoid of manifest powers, is famous as the embodiment of the love-love sentiment because he considers himself an object of compassion.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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