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श्लोक 3.4.30  |
यथा —
स मनाग् अपचीयमान-मध्यः
प्रथिमोपक्रम-शिक्षणार्थि-वक्षाः ।
दधद्-आकुल-काक-पक्ष-लक्ष्मीं
जननीं स्तम्भयति स्म दिव्य-डिम्भः ॥३.४.३०॥ |
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| अनुवाद |
| एक उदाहरण: "पतली कमर, थोड़ी चौड़ी छाती और सिर के पीछे तीन चोटियों वाले आकर्षक बच्चे को देखकर उसकी माँ पूरी तरह से दंग रह गई।" |
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| An example: "His mother was completely stunned by the attractive child with a slim waist, a slightly broad chest, and three braids on the back of his head." |
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