श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 4: वात्सल्य-रस (मातृ पितृत्व भाव)  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.4.20 
यथा —
त्रि-चतुर-दशन-स्फुरन्-मुखेन्दुं
पृथुतर-मध्य-कटि-रकोरु-सीमा ।
नव-कुवलय-कोमलः कुमारो
मुदम् अधिकां व्रज-नाथयोर् व्यतानीत् ॥३.४.२०॥
 
 
अनुवाद
उदाहरण: "यह युवा बालक, जिसके तीन या चार दांत थे, जिसकी कमर और जांघें गोल-मटोल थीं, जो ताजे नीले कमल के समान कोमल था, नंद और यशोदा को असाधारण आनंद दे रहा था।"
 
Example: "This young lad, who had three or four teeth, who had a plump waist and thighs, who was as soft as a fresh blue lotus, was giving extraordinary pleasure to Nanda and Yashoda."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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