| श्री भक्ति रसामृत सिंधु » सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस » लहर 4: वात्सल्य-रस (मातृ पितृत्व भाव) » श्लोक 16 |
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| | | | श्लोक 3.4.16  | वात्सल्यम्, यथा —
अवलम्ब्य कराङ्गुलिं निजां
स्खलद्-अङ्घ्रि प्रसरन्तम् अङ्गने ।
उरसि स्रवद्-अश्रु-निर्झरो
मुमुदे प्रेक्ष्य सुतं व्रजाधिपः ॥३.४.१६॥ | | | | | | अनुवाद | | उनका माता-पिता जैसा स्नेह: "कृष्ण नंद की उँगलियाँ पकड़े हुए लड़खड़ाते पैरों से आँगन में घूम रहे थे। अपने पुत्र को चलते देख, नंद आनंद से भर गए और उनकी छाती आँसुओं से भर गई।" | | | | Their parental affection: "Krishna walked around the courtyard with faltering legs, holding Nanda's fingers. Seeing his son walk, Nanda was filled with joy and his chest filled with tears." | | ✨ ai-generated | | |
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