श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 4: वात्सल्य-रस (मातृ पितृत्व भाव)  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.4.14 
वात्सल्यम्, यथा —
तनौ मन्त्र-न्यासं प्रणयति हरेर् गद्गदमयी
स-बाष्पाक्षी रक्षा-तिलकम् अलिके कल्पयति च ।
स्नुवाना प्रत्यूषे दिशति च भुजे कार्मणम् असौ
यशोदा मूर्तेव स्फुरति सुत-वात्सल्य-पटली ॥३.४.१४॥
 
 
अनुवाद
यशोदा का मातृ-स्नेह: "प्रातःकाल, अपने स्तनों से दूध टपकाते हुए, रुंधे हुए स्वर और आँखों में आँसू लिए, यशोदा ने कृष्ण के अंगों पर मंत्रोच्चार किया, उनकी रक्षा के लिए उनके माथे पर तिलक लगाया और उनकी भुजाओं पर रक्षा-जड़ी-बूटियाँ बाँधीं। वे मातृ-प्रेम की साक्षात मूर्ति थीं।"
 
Yashoda's Motherly Love: "In the morning, with milk dripping from her breasts, a choked voice and tears in her eyes, Yashoda chanted mantras over Krishna's body, applied a tilak on his forehead to protect him, and tied protective herbs on his arms. She was the very embodiment of motherly love."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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