श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 2: दास्य-रस (प्रीति और सेवा)  »  श्लोक 99
 
 
श्लोक  3.2.99 
अत्रायोग-प्रसक्तानां सर्वेषाम् अपि सम्भवे ।
औत्सुक्य-दैन्य-निर्वेद-चिन्तानां चापलस्य च ।
जडतोन्माद-मोहानाम् अपि स्याद् अतिरिक्तता ॥३.२.९९॥
 
 
अनुवाद
"यद्यपि प्रीति-भक्ति-रस के भीतर सभी व्यभिचारी-भावों का अयोग (उत्कंठितम्) में प्रकट होना असंभव है, औत्सुक्य, दैन्यम, निर्वेद, चिंता, चापालता, जड़ता, उन्माद और मोह अधिक सामान्य हैं।"
 
"Although it is impossible for all the adulterous passions within preeti-bhakti-rasa to manifest in ayoga (utkanthitam), utsukya, dainyam, nirveda, anxiety, capriciousness, inertia, frenzy and attachment are more common."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)