श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 2: दास्य-रस (प्रीति और सेवा)  »  श्लोक 92
 
 
श्लोक  3.2.92 
यथा —
शुद्धान्तान् मिलितं बाष्प-रुद्ध-वाग् उद्धवो हरिम् ।
किञ्चित्-कुञ्चित-नेत्रान्तः स्वान्तेन परिषस्वजे ॥३.२.९२॥
 
 
अनुवाद
उदाहरण: "भगवान को भीतरी कक्ष से बाहर आते देख उद्धव की आँखें आँसुओं से भर आईं और उनका स्वर रुँध गया। आँखें हल्की-सी बंद करके उन्होंने भगवान को हृदय से लगा लिया।"
 
Example: "Seeing the Lord emerge from the inner chamber, Uddhava's eyes filled with tears and his voice choked. Closing his eyes slightly, he embraced the Lord."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)