श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 2: दास्य-रस (प्रीति और सेवा)  »  श्लोक 88
 
 
श्लोक  3.2.88 
यथा —
गुरुर् अपि भुजगाद् भीस् तक्षकात् प्राज्य-राज्य-
च्युतिर् अति-शायिनी च प्रायचर्या च गुर्वी ।
अतसनुत मुदम् उच्चैः कृष्ण-लीला-सुधान्तर्-
विहरण-सचिवत्वाद् औत्तरेयस्य राज्ञः ॥३.२.८८॥
 
 
अनुवाद
उदाहरण: "यद्यपि उत्तरा के पुत्र परीक्षित तक्षक सर्प से अत्यधिक भयभीत थे, फिर भी उन्होंने अपना महान राज्य त्याग दिया और आमरण उपवास का कठोर व्रत धारण कर लिया, तथा कृष्ण की लीलाओं का अमृत पीकर परम आनंदित हो गए।"
 
Example: "Although Uttara's son Parikshit was greatly frightened by the serpent Takshaka, he renounced his great kingdom and took the strict vow of fasting unto death, and became ecstatic after drinking the nectar of Krishna's pastimes."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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