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श्लोक 3.2.86  |
यथा वा —
पत्नीं रत्न-निधेः पराम् उपहरन् पूरेण बाष्पाम्भसां
रज्यन्-मञ्जुल-कण्ठ-गर्भ-लुठित-स्तोत्राक्षरोपक्रमः ।
चुम्बन् फुल्लकदम्ब-डम्बर-तुलाङ्गैः समीक्षियाच्युतं
स्तब्धो’प्य् अभ्यधिकां श्रियं प्रणमतां वृन्दाद् दधारोद्धवः ॥३.२.८६॥ |
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| अनुवाद |
| एक और उदाहरण: "कृष्ण को देखते ही उद्धव ने आँसुओं की उत्तम नदी के रूप में भेंट अर्पित की, और जब उन्होंने मनमोहक शब्दों और मधुर स्वर में प्रार्थनाएँ करनी शुरू कीं, तो उनका कंठ रुँध गया। उनके शरीर में रोंगटे खड़े हो गए। वे पूर्णतः स्तब्ध होकर अन्य सभी भक्तों पर अपनी श्रेष्ठता का आभास दे रहे थे।" |
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| Another example: "Upon seeing Krishna, Uddhava offered a perfect river of tears, and as he began to pray in enchanting words and sweet voice, his throat became choked. His hair stood on end. He was completely stunned, giving off a sense of superiority over all other devotees." |
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