श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 2: दास्य-रस (प्रीति और सेवा)  »  श्लोक 76
 
 
श्लोक  3.2.76 
अथ स्थायी —
सम्भ्रमः प्रभुता-ज्ञानात् कम्पश् चेतसि सादरः ।
अनेनैक्यं गता प्रीतिः सम्भ्रम-प्रीतिर् उच्यते ।
एषा रसे’त्र कथिता स्थायि-भावतया बुधैः ॥३.२.७६॥
 
 
अनुवाद
प्रीति-रस का स्थिर भाव: "आदरपूर्वक सेवा करने की उत्सुकता और भगवान की महानता के ज्ञान से उत्कंठा से कांपना, संभ्रम का गुण है। इस संभ्रम के साथ प्रीति का संयोजन संभ्रम-प्रीति कहलाता है। विद्वान इस संभ्रम-प्रीति को प्रीति-रस का स्थिर भाव कहते हैं।"
 
The stable emotion of Priti-rasa: "Eagerness to serve respectfully and to tremble with eagerness from the knowledge of the greatness of the Lord is the quality of Sambhrama. The combination of Priti with this Sambhrama is called Sambhrama-Priti. Scholars call this Sambhrama-Priti the stable emotion of Priti-rasa."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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