श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 2: दास्य-रस (प्रीति और सेवा)  »  श्लोक 73
 
 
श्लोक  3.2.73 
यथा वा —
हरिम् अवलोक्य पुरो भुवि पतितो दण्ड-प्रणाम-शत-कामः ।
प्रमद-विमुग्धो नृपतिः पुनर् उत्थानं विसस्मार ॥३.२.७३॥
 
 
अनुवाद
एक अन्य उदाहरण: "कृष्ण को देखकर बहुलाश्व भूमि पर गिर पड़ा, सोचा कि वह सौ बार प्रणाम करेगा; किन्तु हर्ष से व्याकुल होकर वह उठना ही भूल गया।"
 
Another example: "Beholding Krishna, Bahulasva fell to the ground, intending to offer his obeisances a hundred times; but overcome with joy, he forgot to rise."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)