श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 2: दास्य-रस (प्रीति और सेवा)  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  3.2.40 
सेवा यथा —
उपरि कनक-दण्डं मण्डनो विस्तृणीते
धुवति किल सुचन्द्रश् चामरं चन्द्र-चारुम् ।
उपहरति सुतम्बः सुष्ठु ताम्बूल-वीटीं
विदधति परिचर्याः साधवो माधवस्य ॥३.२.४०॥
 
 
अनुवाद
उनकी सेवा: "मण्डन कृष्ण के सिर पर सोने के मूठ वाला छत्र धारण करते हैं। सुचन्द श्वेत चामर से उन्हें पंखा झलते हैं। सुतम्बा सुपारी चढ़ाती हैं। अनुग भक्त इसी प्रकार माधव की सेवा करते हैं।"
 
His service: "Mandan holds a golden-handled umbrella over Krishna's head. Suchanda fans Him with a white chamara. Sutamba offers betel nuts. Anuga devotees serve Madhava in the same manner."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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