श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 2: दास्य-रस (प्रीति और सेवा)  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.2.4 
अनुग्राह्यस्य दासत्वाल् लाल्यत्वाद् अप्य् अयं द्विधा ।
भिद्यते सम्भ्रम-प्रीतो गौरव-प्रीत इत्य् अपि ॥३.२.४॥
 
 
अनुवाद
"जब दया का पात्र सेवक के रूप में कार्य करता है, तो उसे संभ्रम-प्रीति कहा जाता है और जब पात्र स्वयं को माता-पिता के स्नेह का पात्र मानता है, तो उसे गौरव-प्रीति कहा जाता है।"
 
"When the object of compassion acts as a servant, it is called Sambhrama-priti and when the object of compassion considers himself the object of parental affection, it is called Gaurav-priti."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)