श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 2: दास्य-रस (प्रीति और सेवा)  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  3.2.26 
अथ ज्ञानि-चराः —
ये मुमुक्षां परित्यज्य हरिम् एव समाश्रिताः ।
शौनक-प्रमुखास् ते तु प्रोक्ता ज्ञानि-चराः बुधैः ॥३.२.२६॥
 
 
अनुवाद
ज्ञानी-चारस: "शौनक आदि ऋषिगण जिन्होंने मोक्ष की इच्छा त्याग दी और भगवान की शरण में आ गए, उन्हें बुद्धिमान लोग ज्ञानी-चारस कहते हैं।"
 
Jnani-charas: "The sages like Shaunaka, who gave up the desire for salvation and surrendered to the Lord, are called Jnani-charas by the wise."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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