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श्लोक 3.2.170  |
स्नेहो, यथा —
विमुञ्च पृथु-वेपथुं विसृज कण्ठाकुण्ठायितं
विमृज्य मयि निक्षिप प्रसरद्-अश्रु-धारे दृशौ ।
करं च मकर-ध्वज प्रकट-कण्टकालङ्कृतं
निधेहि सविधे पितुः कथय वत्स कः सम्भ्रमः ॥३.२.१७०॥ |
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| अनुवाद |
| स्नेहा: "हे प्रद्युम्न! यह अत्यधिक काँपना बंद करो और अपनी घुटी हुई वाणी को शांत करो। अपनी आँखों से आँसू पोंछो और मेरी ओर देखो। मुझे अपना रोंगटे खड़े कर देने वाला हाथ दो। हे बालक! अपने पिता के प्रति यह कैसी श्रद्धा है?" |
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| Sneha: "O Pradyumna! Stop this excessive trembling and calm your choked voice. Wipe the tears from your eyes and look at me. Give me your hair-raising hand. O child! What kind of devotion is this towards your father?" |
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