श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 2: दास्य-रस (प्रीति और सेवा)  »  श्लोक 162
 
 
श्लोक  3.2.162 
अथ सात्त्विकाः —
कन्दर्प विन्दति मुकुन्द-पदारविन्द-
द्वन्द्वे दृशोः पदम् असौ किल निष्प्रकम्पा ।
प्रालेय-बिन्दु-निचितं धृत-कण्टका ते
स्विन्नाद्य कण्टकि-फलं तनुर् अन्वकार्षीत् ॥३.२.१६२॥
 
 
अनुवाद
सात्विक भावों का एक उदाहरण: "मुकुंद के चरणकमलों के दर्शन पाकर तुम्हारा शरीर निश्चल हो गया है, पसीने से लथपथ हो गया है, और तुम्हारे रोंगटे खड़े हो गए हैं। तुम्हारा शरीर बर्फ से ढकी हुई फूलों वाली कंटीली झाड़ी जैसा प्रतीत हो रहा है।"
 
An example of Satvik Bhaav: "Having seen the lotus feet of Mukunda, your body has become still, drenched in sweat, and your hair has stood on end. Your body appears like a flowering thorn bush covered with snow."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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