श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 2: दास्य-रस (प्रीति और सेवा)  »  श्लोक 156
 
 
श्लोक  3.2.156 
अथ उद्दीपनाः —
उद्दीपनास् तु वात्सल्य-स्मित-प्रेक्षादयो हरेः ॥३.२.१५६॥
 
 
अनुवाद
“गौरव-प्रीति-भक्तों के लिए उद्दीपन भगवान की स्नेह मिश्रित दृष्टि और मुस्कुराहट के समान है।”
 
“The inspiration for devotees of pride and love is like the affectionate glance and smile of the Lord.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)