श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 2: दास्य-रस (प्रीति और सेवा)  »  श्लोक 147
 
 
श्लोक  3.2.147 
महा-गुरुर् महा-कीर्तिर् महा-बुद्धिर् महा-बलः ।
रक्षी लालक इत्य् आद्यैर् गुणैर् आलम्बनो हरिः ॥३.२.१४७॥
 
 
अनुवाद
"इस गौरव-प्रीति-रस में, कृष्ण विषय हैं, जो एक महान पिता होने, महान यश, महान बुद्धि, महान बल, अपने बच्चों के रक्षक और दुलारने वाले होने के गुणों से संपन्न हैं।"
 
"In this Gaurav-Priti-Rasa, the subject is Krishna, who is endowed with the qualities of being a great father, great fame, great intelligence, great strength, protector and cherisher of his children."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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