श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 2: दास्य-रस (प्रीति और सेवा)  »  श्लोक 145
 
 
श्लोक  3.2.145 
तत्र आलम्बनाः —
हरिश् च तस्य लाल्याश् च भवन्त्य् आलम्बना इह ॥३.२.१४५॥
 
 
अनुवाद
"इस रस के आलंबन भगवान (विषय) और उनके स्नेहपूर्ण संरक्षण में रहने वाले पुत्र या छोटे भाई-बहन हैं।"
 
"The object of this rasa is the Lord (subject) and his sons or younger brothers and sisters living under his affectionate protection."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)