श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 2: दास्य-रस (प्रीति और सेवा)  »  श्लोक 143
 
 
श्लोक  3.2.143 
एषात्र भक्ताभावानां प्रायकी प्रक्रियोदिता ।
किन्तु कालादि-वैशिष्ठ्यात् क्वचित् स्यात् सीम-लङ्घनम् ॥३.२.१४३॥॥
 
 
अनुवाद
"इन श्लोकों में दास्य-भाव के सामान्य भाव दिए गए हैं। विशिष्ट समयों पर सामान्य व्यवहार में अपवाद होंगे।"
 
"These verses give the general meaning of servitude. At specific times, there will be exceptions to the general practice."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)