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श्लोक 3.2.140  |
इति तावद् असाधीयो यत् पुराणेषु केषुचित् ।
श्रीमद्-भागवते चैष प्रकटो दृश्यते रसः ॥३.२.१४०॥ |
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| अनुवाद |
| "उनका मत निराधार है, क्योंकि यह दास्य-रस अनेक पुराणों और श्रीमद्भागवत में स्पष्ट रूप से देखा गया है।" |
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| "Their opinion is baseless, because this Dasya-rasa is clearly seen in many Puranas and Srimad Bhagavatam." |
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