श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 2: दास्य-रस (प्रीति और सेवा)  »  श्लोक 139
 
 
श्लोक  3.2.139 
केचिद् अस्या रतेः कृष्ण-भक्त्य्-आस्वाद-बहिर्मुखाः ।
भवत्वम् एव निश्चित्य न रसावस्थतां जगुः ॥३.२.१३९॥
 
 
अनुवाद
"कुछ लोग, जिन्हें कृष्ण-भक्ति में कोई रुचि नहीं है, दास्य-रति पर विचार करने पर यह निष्कर्ष निकालते हैं कि यह रस की अवस्था तक नहीं पहुँचती।"
 
"Some people, who have no interest in Krishna-bhakti, upon considering dasya-rati, conclude that it does not reach the stage of rasa."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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