श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 2: दास्य-रस (प्रीति और सेवा)  »  श्लोक 137
 
 
श्लोक  3.2.137 
यथा हंसदूते (५०) —
पुरस्ताद् आभीरी-गण-भयद-नामा स कठिनो
मणि-स्तम्भालम्बी कुरु-कुल-कथां सङ्कलयिता ।
स जानुभ्याम् अष्टापद-भुवनम् अवष्टभ्य भविता
गुरोः शिष्यो नूनं पद-कमल-संवाहन-रतः ॥३.२.१३७॥
 
 
अनुवाद
स्थिति का एक उदाहरण, हंसदूत से: "वह क्रूर व्यक्ति, जिसे गोपियों (अक्रूर) ने भयानक नाम दिया है, एक रत्न-स्तंभ का सहारा लेकर, कृष्ण से कौरवों के विषय में चर्चा कर रहा है। बृहस्पति के शिष्य उद्धव, स्वर्णिम भूमि पर बैठकर भगवान के चरणकमलों की मालिश कर रहे हैं।"
 
An illustration of the situation, from the Hamsaduta: "That cruel man, whom the gopis (Akrura) have named terrible, leaning on a gem-like pillar, is discussing with Krishna about the Kauravas. Uddhava, the disciple of Brihaspati, is sitting on golden ground and massaging the Lord's lotus feet."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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