श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 2: दास्य-रस (प्रीति और सेवा)  »  श्लोक 130
 
 
श्लोक  3.2.130 
तत्र सिद्धिः —
उत्कण्ठिते हरेः प्राप्तिः सिद्धिर् इत्य् अभिधीयते ॥३.२.१३०॥
 
 
अनुवाद
"प्रभु से पहले कभी न मिले हुए, बड़ी लालसा के बाद उन्हें प्राप्त करना सिद्धि (अपनी इच्छा की प्राप्ति) कहलाता है।"
 
"To attain the Lord after a longing for Him, having never met Him before, is called Siddhi (attainment of one's desire)."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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